Thursday, March 21, 2013

!!!हिन्दी जुबान इस्लामी तबलीग की इजाद और मुगलों की तामीर!!!


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!!!हिन्दी जुबान इस्लामी तबलीग की इजाद और मुगलों की तामीर!!!
यकीनन मेरे विरोधी 
मेरी इस बात को मज़ाक बतायेगे और मेरे इस लेख को मेरी ना समझी करार देगे, लेकिन ये एक सच्चाई है और सचाई को सबूतों की जरूरत नहीं होती, क्योकि "हक-बर-हक" है
मगर एक मसला ये भी है कि सच्चाई को पहचानने वाले और सच्चाई का साथ देने वाले भी शायद कुच्छ गिने-चुने ही लोग है, इसलिए आज मेने कलम उठाई है और आज मै आप सबको इस सच्चाई से रू-ब-रू कराकर ही रहूगा,
अल्लाह मेरी मदद करे,,,,,,

सबसे पहले में ये बताना चाहुगा कि भाषा या जुबां किसे कहते है,,
भासा या जुबां:- बोलचाल का वो तकनीकी ढांचा जिसके जरिये हम लफ्जों (शब्दों) को जोड़कर आपस में बाते करते है भाषा या जुबां कहलाता है,,,
जैसे कि:-
zubaan ka jhagda bhi aham majmoon hai,
bhaasa ka matbhed bhi mukhya vishay hai
language ka issue bhi main Subject hai
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ganda paani to baikaar cheez hai
ashudh jal to vyarth vastu hai
dirty water to useless thing hai
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एक और मिसाल:-
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mai ye kitaab istemaal karta hu,
mai ye pustak pryog karta hu,
mai ye book use karta hu,
यहाँ मेने तीन-तीन लाइन लिखी है पहली जुबान-ए-हिंद हिंदी (उर्दू) में, दूसरी देवनागरी में और तीसरी इंग्लिश में और ये लाइन मेने ये साबित करने के लिए लिखी है कि इन तीनो लाइन में सिर्फ लफ्जों का हेर-फेर किया गया है लेकिन बुन्यादी ज़बान एक ही है,
pehli line me arbi faarsi ke lafzo ka istemaal kiya gaya,
dusri line me sanskrat ke shabdo ka pryoog kiya gaya,
aur teesri line me english ke words ka use kiya gaya hai,
लेकिन इन तीनो लाइन का तकनीकी ढांचा या बुन्यादी जुबां एक ही है, और यही वो बुन्यादी जुबां है जिसकी बुन्याद सल्तनत काल में इस्लामी तबलीग से जुड़े लोगो और शहंशाहो ने इस्लामी तबलीग के लिए रखी, या हम ये भी कह सकते है कि इस जुबां कि बुन्याद इस्लामी तबलीग और मुसलमान बादशाहों के दरबार में रखी गयी, और मुग़ल काल में इसकी मुकम्मल तामीर मुगलों ने की,
जीहाँ ये बात 100% सच है, और मै दावे के साथ ये कहना चाहता हु की कोई भी इतिहास का जानकार मेरी इस बात को झुटला नहीं सकता, और अगर कोई झुटलाना चाहता है उससे एक सवाल है की:-
जाहिर है की इसमें पहली लाइन जुबान-ए-हिंद हिन्दी (उर्दू) में लिखी गयी है, लेकिन अगर दूसरी लाइन उसी बुन्यादी ज़ुबान की तर्ज़ पर संस्कृत शब्दों का इस्तेमाल करके नागरी में लिख लेने से ये ज़ुबान देवनागरी बन गयी, तो क्या आप तीसरी लाइन को इंग्लिश ज़ुबान कहोगे???
यकीनन तीसरी लाइन को इंग्लिश ज़ुबान कहा जाना चाहिए, लेकिन नहीं कहा जाता
क्योकि अंग्रेजो ने मुसलमानों को लूटने तबाह करने के बावजूद भी कभी कोई ऐसी चाल नहीं चली जिससे वे मुसलमानों के अदब तहजीब और ज़ुबान पर कब्ज़ा करते, या यू कहे कि उनकी ज़ुबान उनका अदब या साहित्य इतना कमजोर नहीं था की उन्हें किसी की ज़ुबान पर डांका डालने की जरूरत पड़े, लेकिन सनातन-आर्यों ने ऐसा किया क्योकि उनका साहित्य सिर्फ और सिर्फ संस्कृत तक ही सिमित था, जो सलतनत काल और मुग़ल काल में अवधि और ब्रज भाषा तक पंहुचा,
इस घिनोनी सियासत का पर्दा फाश करने के लिए मै आप सब को हिन्दुस्तान के उस गुजरे ज़माने में लेजाना चाहुगा जहा से इस बुन्यादी जुबान का आगाज़ हुवा,,,
बात है उस वक़्त की जब इस देश पर मुसलमान शहंशाहो की हुकूमत हुई, तो उन सभी शहंशाहो ने इस देश का नाम हिन्दुस्तान रखा, इतिहास गवाह है इस बात का कि मुसलमान बादशाहों के आने से पहले इस देश का नाम हिन्दुस्तान नहीं था, बल्कि हमेशा से छोटी-छोटी बहुत सी रियासते थी, जिनके नाम भी अलग-अलग थे, यानी मुसलमान शहंशाहो ने ही इस देश को हिन्दुस्तान नाम दिया, अब गौर करने वाली बात है कि इन बादशाहों की मादरी जुबान फ़ारसी थी, और हिन्दुस्तान के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग भाषाए बोली जाती थी, जैसे कि:- अवधि, पंजाबी, मैथिलि, ब्रज भासा, बंगाली, तमिल, गुजराती, तेलगु, मराठी वगैरा-वगैरा,,,,
उस वक़्त हिंदुस्तान में कई भासये मौजूद थी मगर ये बुन्यादी ज़बान उनमे से किसी भाषा का हिस्सा नहीं,,,
उस वक़्त हिन्दुस्तान में कई धरम मौजूद थे लेकिन ये अदब ये तहज़ीब उनमे से किसी धरम किसी समप्रदाय का हिस्सा नहीं सिवाय मुसलमानों को छोड़कर,,,
जी हां ये 100% सच है, और मै यही सच्चाई आज सबके सामने लाना चाहता हु,
अगर आप इतिहास कि उन सभी हस्तियों पर नज़र डाले जिन्होंने अपने कलम और कलाम से अदबी खिदमात दी तो आप देखेगे की आदि काल से लेकर 1857 तक इस बुन्यादी ज़ुबान का इस्तेमाल जिन लोगो ने भी किया वो कही ना कही मुस्लिम कल्चर से जुड़े हुवे थे, जी हां ये एक कड़वी सच्चाई है, और इससे भी बड़ी सच्चाई ये है की इस बुन्यादी जुबान की संग-ए-बुन्याद हजरत निजामुद्दीन औलिया उनके गुरु बाबा फरीद गंज-ए-शकर और उनके मुरीदो ने सन 1260-1270 के आस-पास रख्खी,
इसका सबूत है हजरत निज़ामुद्दीन औलिया के एक मुरीद अमीर खुसरो का कलाम जो आज भी आसानी से कही भी पढने को मिल सकता है, और ये कलाम इसी बुन्यादी जुबान की तर्ज़ पर अवधि भाषा के शब्दों का इस्तेमाल करके हजरत निज़ामुद्दीन औलिया की तारीफ में लिखा गया है:-
बहुत कठिन है डगर पनघट की।
कैसे मैं भर लाऊँ मधवा से मटकी
मेरे अच्छे निज़ाम पिया।
कैसे मैं भर लाऊँ मधवा से मटकी
ज़रा बोलो निज़ाम पिया।
पनिया भरन को मैं जो गई थी।
दौड़ झपट मोरी मटकी पटकी।
बहुत कठिन है डगर पनघट की।
खुसरो निज़ाम के बल-बल जाइए।
लाज राखे मेरे घूँघट पट की।
कैसे मैं भर लाऊँ मधवा से मटकी
बहुत कठिन है डगर पनघट की।
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आज रंग है ऐ माँ रंग है री, मेरे महबूब के घर रंग है री।
अरे अल्लाह तू है हर, मेरे महबूब के घर रंग है री।
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ये देखिये सबूत, ये अमीर खुसरो का कलाम है जो उसी बुन्यादी जुबान में अवधि के शब्दों का इस्तेमाल करके लिखा गया है,,, ठीक उसी तरह जिस तरह मेने ऊपर तीन-तीन लाइने लिख कर दिखाई है,
यहाँ ये साबित होता है की इस बुन्यादी जुबान की इजाद इसी दौर में इन्ही लोगो ने की, लेकिन अब सवाल सामने आता है की इस बुनादी जुबान की जरूरत क्यों पड़ी?
आइये इस मसले को भी समझते है,,,
क्योकि इस वक़्त तक तमाम मुसलमान फ़ारसी बोलते थे और इस देश में रहने वाले तमाम गैर-मुस्लिम अलग-अलग इलाको में बोली जाने वाली ज़ुबाने बोलते थे,
हजरत निज़ामुद्दीन औलिया और उनके मुरीदो ने मुसलमानों और गैर मुस्लिम को नजदीक लाकर दीन इस्लाम उनतक पहुचाने के लिए हिंदी या हिन्दवी नाम से एक ऐसी बुन्यादी जुबान इजाद की जिसमे अगर फ़ारसी के लफ्ज़ मिलाकर बोला जाए तो फ़ारसी बोलने वाले मुसलमान इस जुबान को समझ लेते थे और अगर अवधि, ब्रज या संस्कृत भाषा के शब्द मिला कर बोला जाए तो फ़ारसी और इस बुन्यादी जुबान से अनजान तमाम गैर मुस्लिम भी इसे समझ लेते थे, सल्तनत काल में ही ये जुबान मुसलमानों और गैर मुस्लिम के बीच की कड़ी बन गयी, इसी बुन्यादी जुबान की बदौलत मुसलमानों ने इस्लाम को गैर मुस्लिम लोगो तक पहुचाया, इसी बुन्यादी जुबान के जरिये हिन्दुस्तान में इस्लाम फैला, जो भी गैर-मुस्लिम इस्लाम को कुबूल करते वो इस बुन्यादी जुबान को अरबी-फ़ारसी के साथ अपना लेते, और इस बुन्यादी जुबान को लिखने के लिए ( نستعلیق ) नाम की उसी तहरीर का इस्तेमाल करते जिस तहरीर में फ़ारसी लिखी जाती है, यानी उस वक़्त दिल्ली सलतनत का नाम हिन्दुस्तान और यहाँ पर बोली जाने वाली जुबान का नाम हिंदी रखा जा चूका था, इस तरह हम कह सकते है की इस वक़्त तक इस देश में हिन्दुस्तान के साथ पैदा हुई एक बुन्यादी जुबान हिंदी वजूद में आचुकी थी,
लेकिन जैसे-जैसे वक़्त आगे बढ़ता है इस बुन्यादी जुबान हिंदी के बनाने वाले हजरत निज़ामुद्दीन औलिया, उनके उस्ताद बाबा फरीद गंज-ए-शकर, उनके मुरीद अमीर खुसरो और हजरत निज़ामुद्दीन औलिया साहब के बाकी मुरीद इस दुन्या से रुखसत हो जाते है, उनके जाने के बाद भी ये जुबान तो तरक्की करती है लेकिन इसका वो नाम जो हजरत निज़ामुद्दीन औलिया साहब और अमीर खुसरो साहब ने इसे दिया था वो बदलते वक़्त में ना जाने कहा खो जाता है,
गुजरते वक़्त के साथ-साथ इस बुन्यादी जुबान के कई नाम सामने आते है, जैसे कि:-
जुबान-ए-देहलवी, कड़ी बोली, रेख्ताँ, दकिनी, उर्दू-ए-मोअल्ला, जुबान-ए-उर्दू, और जुबान-ए-अहले-हिंद या जुबां-ए-हिंद वगेरा वगेरा,,,
मै एक बार फिर उसी बात पर फिरसे जोर देना चाहुगा की 17 वी सदी तक ये बुन्यादी जुबान उन लोगो की जुबान थी जो हिन्दुस्तान के एक हिस्से से दुसरे हिस्से में जा जा कर दीन-इस्लाम फैला रहे थे, हिन्दोस्तान के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग भाषाए थी, इसलिए ये इस्लाम को फैलाने वाले हिन्दोस्तान के जिस हिस्से में जाते उस जगह की भाषा के लफ्जों को इस बुन्यादी जुबान के साथ जोड़कर बोलते, ऐसा करने से वहा के लोग भी इनकी बातको समझ लेते थे और इन्हें इस्लाम की बाते उन्हें समझाने में मदद मिलती थी, जैसा की आज के दौर में कई इस्लामिक जमाते मिसाल के तौर पर तबलीग जमात, तबलीग जमात के लोग भी हिन्दोस्तान के तमाम अलग-अलग भाषाओ वाले हिस्से में आज भी जाते है और इसी बुन्यादी जुबान का इस्तेमाल करके इस्लाम को आम लोगो तक पहुचाते है,
और अब मै बात को आगे बढ़ाते हुवे बताना चाहुगा की यही बुन्यादी जुबान 17 वी सदी के आखिर तक मुघलो की शाही जुबान बनजाती है, इसी दौर में उर्दू नाम के साथ इस बुन्यादी जुबान की तामीर मुकम्मल होती है,
यानी मुग़ल काल में इस जुबान को मुघलो के अपना लेने के बाद इस हद तक तामीर किया जाता है की ये जुबान हिन्दुस्तान की शाही जुबान बन जाती है, शाही दरबार की जुबान बन जाती है, यहाँ तक की खुद शहंशाह इस बुन्यादी जुबान में अपने कलाम पैस करते है,,
इसलिए ये कहना गलत नहीं है की हजरत निजामुद्दीन औलिया उनके गुरु बाबा फरीद गंज-ए-शकर और उनके मुरीदो ने इस बुन्यादी जुबान की संग-ए-बुन्याद रख्खी और मुघलो ने इस की तामीर मुकम्मल की,
मुग़ल काल में ये जुबान एक मुकम्मल जुबान के वजूद में उस वक़्त आती है जब इसकी पहुँच मुघलो के शाही दरबार तक हो जाती है, जी हां पीर फकीरों और तबलीगी लोगो की इस बुन्यादी जुबान से मुग़ल शहंशाह भी इतने मुतास्सिर होते है की फ़ारसी को छोड़कर इस बुन्यादी जुबान को शाही जुबान कुबूल करते है, शाही दरबार तक पहुचने के बाद इस जुबान की अदबी तरक्की बड़ी तेजी से होती है और जल्द ही ये बुन्यादी ज़ुबान यानी हिंदी यानी रेख्ताँ यानी खड़ी बोली यानी ज़ुबान-ए-देहलवी या आजतक के मशहूर नाम यानी उर्दू हिन्दुस्तान के तमाम शायरों और लेखको की अदबी (साहित्यक) ज़ुबान बन जाती है, मुग़ल काल के आखरी दौर आने तक ये ज़ुबान तब्लीगियो, पीर-फकीरों, मुसलमानों और मुग़लों तक सिमटी ना रहकर तमाम हिन्दुस्तान में बोली और समझी जाने लगती है, इस दौर तक ये एक आम इंसान की ज़ुबान बन जाती है,
आगे मै ये कहना चाहुगा की मुग़ल काल में ये ज़ुबान हिन्दुस्तान की शाही ज़ुबान बनी, ये इस ज़ुबान की बहुत बड़ी खुस्किस्मती थी, लेकिन बद-नसीबी भी अभी इस ज़ुबान के साथ जुड़ी थी, और वो बद-नसीबी ये थी की जो हिंदी नाम हज़रत निजामुद्दीन औलिया और अमीर खुशरो ने इसे दिया था वो वक़्त के थपेड़ो में कही खो जाता है, और एक ऐसा नाम जो इस ज़ुबान को नाम से भी गरीब और लाचार दिखाता है, इस ज़ुबान पर थोप दिया जाता है, यानी टूटी-फूटी ज़ुबान, यानी बिखरी हुई ज़ुबान, यानी लश्कर जैसी, यानी उर्दू,
खैर जाने दो क्योकि ये सब जो भी हुवा वो किसी के जरिये इस ज़ुबान के लिए बुरा चाह कर इसके साथ साजिश करने से नहीं हुवा, इस वक़्त तक इस ज़ुबान को हिंदी नाम की जगह उर्दू नाम दिया जाना महज़ एक नासमझी या इत्तेफाक था साजिश नहीं, इस इत्तेफाक या ना- समझी का ही सनातन-आर्य फायदा उठाते है,
इस तरह इस ज़ुबान के साथ साजिश तो 1890 के आस-पास उस वक़्त होती है जब नागरी लिपि में लिख कर इसे देवनगर की ज़ुबान घोषित किया जाता है,
जी हां हज़रत निजामुद्दीन औलिया जैसे पीर फकीरों और तब्लीगियो की इस बुन्यादी ज़ुबान हिंदी के साथ ये सबसे बड़ी साजिश थी, और ये साजिश की थी सनातन-आर्यों ने,
ये बात 100% सच्च है, एक हकीकत है और इसका सबूत है हमारा इतिहास, बेशक तारीख गवाह है इस की,,, और रहा सवाल साबित करने का, तो कसम परवरदिगार की अल्लाह के करम से आज मै ये साबित करके ही रहूगा,
सबसे पहले मै बताना चाहुगा की देवनगर काशी यानी बनारस को कहा जाता है, और देवनागरी उस तहरीर (lipi) को कहा जाता है जो संस्कृत लिखने में इस्तेमाल होती है,
अब यहाँ मै ये सवाल सबके सामने लाना चाहता हु की देवनगर और देवनागरी का रिश्ता क्या है?
क्या सच-मच ये तहरीर (लिपि) देवनगर की इजाद है?
जवाब है हरगिज नहीं,
क्योकि हजारो साल पहले वैदिक काल में वेदों के लिखने वालो ने इस तहरीर (लिपि) को इजाद किया, ये बात सब जानते है, हां ये बात गौर करने वाली है की उस वक़्त और हजारो साल बाद 18 सदी तक इस तहरीर (लिपि) को ब्राह्मी लिपि कहा जाता रहा, लेकिन 1857 के बाद इस देश से मुसलमानों की हुकुमत ख़तम होने के बाद सन 1870-1880 के आस-पास इस देश हिन्दुस्तान और इसकी ज़ुबान ज़ुबान-ए-हिन्द हिन्दी का भगवाकरण करने की साजिशे सुरू हो जाती है,
और इसी साजिश के तहत ब्राह्मी लिपि को देवनागरी नाम से प्रायोजित किया जाता है, फिर उस बुन्यादी ज़ुबान को जिसे हज़रत निजामुद्दीन औलिया और अमीर खुसरो ने इजाद किया और मुगलों ने मुकम्मल तामीर किया और सजाया, उसी ज़ुबान का भगवा करण करने के लिए उस बुन्यादी ज़ुबान को इस तहरीर (लिपि) में लिख कर इसे देवनगर की ज़ुबान बताकर पेश किया जाता है, और इस साजिश को नाम दिया जाता है देवनागरी हिन्दी का और ये सब 1893 के बाद होता है,
यहाँ पर मै ये कहना चाहुगा की 1893 के बाद साजिशो के तहत अहले-हिंद की ज़ुबान ज़ुबान-ए-हिन्द-हिन्दी (उर्दू) को संसकिरत के लफ्जों के साथ लिख कर उसका भगवा करण करने के लिए एक नये नाम यानी देवनागरी हिन्दी बताकर पेश किया जाता है,
लेकिन क्या सच-मुच हज़रत निजामुद्दीन औलिया और अमीर खुसरो की इजाद की हुई ये ज़ुबान देवनगर में पैदा हुई या देवनगर में कभी ये ज़ुबान मुसलमानों को छोड़ आम इंसान की ज़ुबान या अदबी (साहित्यिक ) ज़ुबान रही है, आइये गौर करे,,,
मै शुरू करता हु आदि काल से,,,
आदि काल सन. 1400 से पहले के वक़्त को कहा जाता है, मुसलमान सूफी-संतो से पहले कवि चंदरबरदाई इस दौर के ऐसे कवी है जिन्हें देवनागरी हिन्दी साहित्य में शामिल किया गया है, अब यहाँ मै ये सवाल उठाना चाहुगा की कवि चंदरबरदाई को देवनागरी हिंदी साहित्य में शामिल करने के पीछे क्या मकसद छुपा है?
क्या सच्च-मुच कवि चंदरबरदाई का कलाम हिन्दी ज़ुबान में लिखा गया है?
आइये गौर करे,,, और देखे कवि चंदरबरदाई का ये कलाम,,,
रघुनाथनचरित हनुमंतकृत भूप भोज उद्धरिय जिमि ।
पृथिराजसुजस कवि चंद कृत चंदनंद उद्धरिय तिमि ।।
इस कलाम को सुनकर कर तो कोई अनपढ़-जाहिल भी ये बता देगा की ये हिन्दी नहीं है, लेकिन जरा सोचिये की देवनागरी हिंदी साहित्य लिखने वाले महान विद्वानों के दिमाग को क्या हो गया है जो वे इस कलाम की ज़ुबान को देवनागरी हिन्दी बताते है,,,
कवि चंदरबरदाई के कलाम की ज़ुबान को हिन्दी कहना इनके दिमाग की कमी नहीं बल्कि इनके दिमाग की साजिश है, और इस साजिश के पीछे इनका मकसद है, देवनारी हिन्दी ज़ुबान को हज़रत निजामुद्दीन औलिया, अमीर खुशरो और बाकी तब्लीगियो से पहले पैदा हुई ज़ुबान साबित करना, सिर्फ और सिर्फ इस मकसद के लिए ये झूट का पुलिंदा बांधा गया है,
यहाँ ये साबित हो जाता है की इस दूर में हज़रत निजामुद्दीन औलिया, बाबा फरीद गंज-ए-शकर और अमीर खुसरो, और बाकी वे तमाम मुसलमान सूफी-संत या पीर-फ़कीर जो इस्लामी तबलीग से जुड़े थे सिर्फ और सिर्फ उनके कलाम में ये बुन्यादी ज़ुबान देखने को मिलती है,
सिर्फ आदि काल नाम का ये दौर ही सनातन-आर्यों की इस साजिश का पर्दा फाश करने के लिए काफी है, क्योकि सनातन-आर्यों ने देवनागरी हिन्दी साहित्य के इतिहास में इस दौर को भी सामिल किया है, और हज़रत निजामुद्दीन औलिया अमीर खुशरो की बुन्यादी ज़ुबान को साजिश के तहत देवनागरी बताया है,
अब ये सवाल सामने आता है कि
क्या हज़रत निजामुद्दीन औलिया अमीर खुशरो देवनगर से ये ज़ुबान सीख कर आये या देवनगर ने ये ज़ुबान अमीर खुशरो से सीखी?
इतिहास गवाह है 18 वी सदी तक देवनगर में अवधि जुबान ही बोली जाती थी तुलसी दास के सन-1650 के आस-पास लिखे हुवे कलाम में भी इस बुन्यादी ज़ुबान का कोई नामो निशान नहीं क्योकि तुलसी दास का कलाम पूरी तरह से अवधि भासा में ही लिखा गया है, और इसका सबूत है तुलसी दास का ही ये कलाम:-
आखर मधुर मनोहर दोऊ. बरन बिलोचन जन जिय जोऊ ..
सुमिरत सुलभ सुखद सब काहू. लोक लाहु परलोक निबाहू ..
कहत सुनत सुमिरत सुठि नीके. राम लखन सम प्रिय तुलसी के ..
यहाँ पर मै ये बताना चाहुगा कि 17 वी सदी तक काशी यानी देवनगरी में इस बुन्यादी ज़ुबान का कोई नामोनिशा नहीं था, इसका सबूत तुलसी दास का कलाम है, बेशक तुलशी दास का कलाम इस बुन्यादी ज़ुबान में लिखा हुवा नहीं है, और तुलशी दास का कलाम ये भी साबित करता है कि उस वक़्त तक देवनगर (काशी) में गैर मुस्लिमो में ये बुन्यादी ज़ुबान नहीं बोली जाती थी,
यहाँ पर ये बात साबित होती है कि 18 वी सदी तक देवनगर यानी काशी में संस्कृत और अवधि का ही बोल-बाला था,
आइये अब देखे कि क्या उस दौर में हिन्दोस्तान में किसी और जगह ये ज़ुबान गैर मुस्लिमो कि ज़ुबान थी या नहीं,,, तो मै बताना चाहुगा कि,,,
तुलशी दास भक्ति काल के कवि है और भक्ति काल भी देवनागरी हिंदी साहित्य में बड़ा अहम् मकाम रखता है, इस दौर के कवियों में तुलसीदास के अलावा मलिक मुहम्मद जायसी, कबीर दास और सूरदास का नाम अहम् है, अब देखने वाली बात ये है कि किया इनलोगों का कलाम में उस बुन्यादी ज़ुबान हिन्दी कि झलक दिखाई देती है जो इस वक़्त तक मुसलमानों कि आम ज़ुबान बन गयी थी,
यहाँ पर मै कबीर दास और मलिक मुहम्मद जायसी को नज़र अंदाज करने कि हिमायत करूंगा क्योकि ये बात मै पहले ही कह चूका हु कि ये बुन्यादी ज़ुबान हिन्दी उस दौर में सिर्फ उन लोगो के कलाम में मिलती है जो या तो मुसलमान है या कही न कही इस्लामी तबलीग या इस्लामी तहज़ीब से जुड़े हुवे है, अब बचे सूरदास तो ये देखो सूरदास का कलाम:-
जसोदा कहां लौं कीजै कानि।
दिन प्रति कैसे सही जाति है दूध-दही की हानि॥
अपने या बालक की करनी जो तुम देखौ आनि।
गोरस खा ढूंढ़ि सब बासन भली परी यह बानि॥
मैं अपने मण-दिर के कोनैं माखन राख्यौ जानि।
सो जा तुम्हारे लरिका लोनों है पहिचानि॥
बूझी ग्वालिनि घर में आयौ नैकु व संका मानि।
सूर स्याम तब उत्तर बनायौ चींटी काढ़त पानि॥१५॥
सूरदास के कलाम को देखकर ये बात सामने आती है कि सूरदास का कलाम ब्रज भाषा में लिखा गया है, इससे ये साबित होता है कि 17 वी सदी तक देवनगर तो क्या बल्कि तमाम हिन्दुस्तान में सिर्फ मुसलमानों और इस्लामी तहज़ीब से जुड़े लोगो में ही इस बुन्यादी ज़ुबान हिन्दी का इस्तेमाल होता था, और गैर मुस्लिम में 18 वी सदी तक इस तमाम इलाके में अवधि और ब्रज भाषा का ही इस्तेमाल होता रहा,
लेकिन हज़रत निजामुद्दीन औलिया और अमीर खुशरो कि इस बुन्यादी ज़ुबान हिन्दी ने लोगो के दिलो पर कुछ ऐसा असर किया की दिल्ली, U. P. और उसके आसपास बोली जाने वाली अवधि और ब्रज भाषा लगभग गायब होगई, और हज़रत निजामुद्दीन औलिया और अमीर खुशरो की इस बुन्यादी ज़ुबान हिन्दी इस तमाम इलाके पर छा गयी,
फिर हज़रत निजामुद्दीन औलिया और अमीर खुशरो की इस बुन्यादी ज़ुबान हिन्दी के मुगलों की शाही ज़ुबान बन्ने और अंग्रेजो के इस ज़ुबान को तरजीह देने के बाद इस इलाके के तमाम गैर मुस्लिम लोगो ने भी इस ज़ुबान को अपना लिया,
ये दौर 1857 के आस पास के आस-पास का दौर था जब हिन्दुस्तान में पहली जंग-ए-आजादी लड़ी गयी, इस पहली जंग-ए-आजादी में इस बुन्यादी ज़ुबान को सबसे जियादा मकबूलियत मिली क्योकि आजादी के परवाने हिन्दुस्तान के अलग-अलग हिस्सों के और अलग-अलग भाषा के होते थे, तब वे इसी बुन्यादी ज़ुबान को अपनी-अपनी भाषा के लफ्जों के साथ मिलाकर बोलते और आपस में बाते करते थे, इस तरह इस जंग-ए-आजादी ने हज़रत निजामुद्दीन औलिया और अमीर खुशरो की इस ज़ुबान को तमाम गैर मुस्लिमो में भी मशहूर कर दिया,
सिर्फ गैर मुस्लिम अवाम ही नहीं बल्कि उस दौर के बड़े बड़े नेता भी अपनी मादरी ज़ुबान को छोड़कर इस बुन्यादी ज़ुबान हिन्दी को अपनाने लगे इन नेताओं में सबसे बड़ी मिसाल खुद महात्मा गाँधी की है, उन्होंने गुजरात का होने के बावजूद गुजराती को छोड़ हज़रत निजामुद्दीन औलिया और अमीर खुशरो की इस बुन्यादी ज़ुबान हिन्दी को तरजीह दी,
धीरे-धीरे वक़्त बीत रहा था अब हमारी प्यारी हिन्दी अपने शबाब पर थी, लेकिन 1890 के आस-पास इस ज़ुबान के पीछे कुछे ऐसे लोग पद गए जिन्हों ने इसे लूट कर इसे अपनी जागीर बताना शुरू कर दिया, और इसका भगवाकरण करने लगे,
जीहां सों 1880 - 1890 के बाद इसी ज़ुबान को देवनागरी तहरीर में लिख कर इसे देवनागरी बताकर इसका भगवाकरण किया जाने लगा, और इसका भगवाकरण करने वालो में सबसे अहम् नाम देवकी नंदन खत्री, श्याम शुन्दर दास, राम चंद्र शुक्ल और मदन मोहन मालवीय है, और बाकी कई नेता,
जी हां यही वे कुछ अहम् नाम है जिन्हों ने इस साजिश को अंजाम दिया,
और ये साजिश कुछ यू थी:-
उस दौर में तब्लीगियो की ज़ुबान हज़रत निजामुद्दीन औलिया और अमीर खुशरो की हिन्दी दिल्ली से बाहर आकर तमाम हिन्दुस्तान पर छा चुकी थी, या ये कहना मुनासिब होगा की इस वक़्त तक हज़रत निजामुद्दीन औलिया और अमीर खुशरो की ये बुन्यादी ज़ुबान हिन्दुस्तान की पहचान बन चुकी थी,तमाम हिन्दोस्तान के अलग-अलग भाषा और अलग-अलग जाती के लोग इस बुन्यादी ज़ुबान के जरिये ऐसे जुड़ गए थे जैसे एक धागे में डालकर माला के मोती एक दुसरे से जुड़ जाते है,
लेकिन अब बादशाही का दौर ख़तम हो चूका था, और सियासत का दौर शुरू हो गया था, और ये सियासत थी हिन्दुस्तान को हासिल करने की, इस देश को हासिल करने के लिये दो दावेदार थे, एक तरफ मुसलमान और दूसरी तरफ सनातन-आर्य, हिन्दोस्तान की अवाम पर जुबानी, अदबी और मजहबी पकड़ के मामले में दोनों दावेदारों की अपनी अपनी कमजोरिया थी, जैसे की:-

हिन्दुस्तान की अवाम पर मुसलमानों की अदबी और जुबानी पकड़ मजबूत थी लेकिन मजहबी पकड़ कमजोर थी
और सनातन-आर्यों की अवाम पर मजहबी पकड़ मजबूत थी लेकिन अदबी और जुबानी पकड़ ना के बराबर थी,

मुसलमानों की हिन्दुस्तान की अवाम पर जुबानी और अदबी पकड़ बहुत मजबूत थी क्योकि सारा हिन्दुतान मुसलमानों की ज़ुबान बोलने लगा था, लेकिन मुसलमानों की अवाम पर मजहबी पकड़ कमजोर थी क्योकि यहाँ के लोग मूर्ति पूजा करते थे और मुसलमान मूर्ति पूजा के खिलाफ थे,
सनातन-आर्यों की हिन्दुस्तान की अवाम पर मजहबी पकड़ मजबूत थी क्योकि ये मूर्ति पूजक थे लेकिन इनकी जुबानी और अदबी पकड़ कमजोर थी क्योकि इनकी अदबी ज़ुबान संस्कृत थी और ये हिन्दुस्तान में उस वक़्त कही भी नहीं बोली जाती थी,
इस तरह सियासत के इस दौर में हिन्दुस्तान पर हुकुमत करने के लिये सनातन-आर्य एक नयी चाल चलते है, चाल थी मुसलमानों की उस बुन्यादी ज़ुबान को अपनी ज़ुबान बताकर कब्जा करना जिसे मुसलमानों के साथ-साथ तमाम हिन्दुस्तान बोलता था, अब एक फरेब का जाल फैलाकर इस ज़ुबान को देवनगर की जुबान साबित करने की कोशिस की जाती है और ये फरेब का जाल था नागरी (लिपि), जी हां ये वो तहरीर है जो सदियों से ब्राह्मी लिपि के नाम से मौजूद थी लेकिन इस दौर में भी हिन्दुस्तानियों के लिये अजनबी जैसी थी, सनातन-आर्य देवनगर में इस तहरीर (लिपि) का प्रचार कर रहे थे, इस तहरीर (लिपि) को हिन्दोस्तान में फैलाने के लिये पहले तो सनातन-आर्यों ने हज़रत निजामुद्दीन औलिया और अमीर खुशरो की इस बुन्यादी ज़ुबान को नागरी तहरीर में लिखा शुरू किया और फिर इस बुन्यादी ज़ुबान को संस्कृत के लफ्जों के साथ लिख कर इसे देवनगर की ज़ुबान बताने लगे,
ये वक़्त था son 1890 के आस-पास का, और इसका सबूत है देवकी नन्दन खत्री का लिखा वो उपन्यास जिसका नाम है चन्द्रकान्ता, जो संस्कृत और हिन्दुस्तानी लफ्जों को साथ मिलाकर बेशक इसी जुबान में लिखा गया है, यहाँ पर मै ये भी बताना चाहूँगा की देवकी नंदन खत्री उर्दू और फारसी से पढ़े थे, इसलिए वे इस बुन्यादी जुबान के बहुत उमदा जानकार थे, यही वजह थी जो उन्होंने नागरी तहरीर (लिपि) में इस जुबान को इतनी ख़ूबसूरती से लिखा, ये पहला वाक्य था जब इस बुन्यादी जुबान को नागरी तहरीर में लिखा गया था, इस के बाद से ही ये सिलसिला चला,
लेकिन इस वक़्त तक नागरी महज़ एक तहरीर (लिपि) थी कोई जुबान (भाषा)नहीं थी, उस वक़्त तक नागरी के साथ हिन्दी लफ्ज़ नहीं जुदा था, इसका सबूत है नागरी प्रचारणी सभा, जिसे 1893 में श्याम सुन्दर दास और उनके साथियो ने इस तहरीर जिसका नाम उस वक़्त तक नागरी ही था, को मशहूर करने के लिए बनाया था,
यहाँ पर मै ये बताना चाहूँगा की इसका नाम देवनागरी भी बाद में रखा गया उस वक़्त तक इस तहरीर का नाम सिर्फ और सिर्फ नागरी था,
नागरी लफ्ज़ नागर लफ्ज़ से बना है, नागर ब्राह्मन को कहा जाता था और ब्राह्मणों की तहरीर (लिपि) होने की वजह से इस तहरीर को नागरी कहा जाता था और देवनगर काशी को कहा जाता था, देवनगर और देवनागरी का कोई रिश्ता नहीं था ये मै पहले ही साबित कर चूका हु,
देवनगर के साथ नागरी लफ्ज़ को इसी साजिश के तहत जोड़ा गया था, यानी सन 1893 तक जब श्याम सुन्दर दास और उनके साथियो ने इस तहरीर (लिपि) को फैलाने के लिए नागरी प्रचारणी सभा नाम से ये तन्जीम बनाई थी उस वक़्त तक भी इसका नाम सिर्फ नागरी ही था,
फिर मदन मोहन मालवीय, बाकी नेताओं, श्याम शुन्दर दास, देवकी नंदन खत्री और राम चन्द्र शुक्ल जैसे कई अदीबो की सियासी चालो के जरिये हज़रात निजामुद्दीन औलिया और अमीर खुशरो की जुबान हिन्दी और मुसलमान शहंशाहो के वतन हिन्दुस्तान और फ़ारसी लफ्ज़ हिन्दू का भगवाकरण करने के लिए एक साजिश के तहत नागरी (लिपि) को देवनगर से जोड़कर देवनागरी लिपि कहा जाने लगा,
और हज़रात निजामुद्दीन औलिया और अमीर खुशरो की हिन्दी को भी देवनागरी से जोड़कर देवनागरी हिंदी कहना शुरू किया, फिर हज़रत निजामुद्दीन औलिया और अमीर खुशरो की उसी जुबान को संस्कृत के लफ्जों के साथ लिखकर संस्कृत से देवनगर में पैदा हुई जुबान बताया जाने लगा, जबकि हकीकत ये है की उस दौर तो क्या बल्कि कभी भी देवनगर में ये जुबान नहीं बोली गयी,
इसी दौर में और भी कई ऐसी चाले चली गयी जिनके जरिये लफ्ज़ हिन्दी, हिन्दू और हिंदुस्तान का भगवाकरण किया गया, जैसे की हिन्दू लफ्ज़ को सनातन धरम से जोड़ा गया जिससे हिंदुस्तान उनके बाप की जागीर लगने लगे क्योकि हिंदुस्तान लफ्ज़ हिन्दू लफ्ज़ की बुन्याद पर बना है, इसलिए हिन्दू लफ्ज़ का भगवाकरण किया गया जिससे हिंदुस्तान खुद ब खुद भगवा देश दिखने लगा,
ये सभी चाले इस वतन में मुसलमानों को कमजोर करने के लिए चली गयी, और ये चाले कामयाब तब हुई जब मुसलमान इन चालो को नहीं समझ पाए और सनातन-आर्यों ने हिन्दी, हिन्दू और हिंदुस्तान जैसे लफ्जों का भगवाकरण करके मुसलमानों के वतन, मिलकियत, ज़मीन, यहाँ तक की जुबान और तहज़ीब भी कब्ज़ा कर लिया,
अब आप गौर करे की हिंदुस्तान में मुसलमानों को लूटने वालो का जिक्र हो तो दो नाम ही सामने आयेंगे पहला नाम है अंग्रेज और दूसरा नाम सनातन-आर्य,
अंग्रेज जब हिन्दुस्तान में आये उस वक़्त हिन्दुस्तान में मुसलमानों की हुकुमत थी, अंग्रेजो ने मुसलमानों से बादशाही छीनी, कतल किया, खून बहाया, मिलकियत पर कब्ज़ा किया, दौलत छीनी,मुसलमानों को हर तरह से तबाह-ओ-बर्बाद करदिया, इतना सब होने के बावजूद भी मुसलमानों की जुबान, अदब और तहजीब सलामत थी,
क्योकि अंग्रेजो ने मुसलमानों को लूटने तबाह करने के बावजूद भी कभी कोई ऐसी चाल नहीं चली जिससे वे मुसलमानों के अदब तहजीब और जुबान पर कब्ज़ा करते, या यू कहे की उनकी जुबान उनका अदब या साहित्य इतना कमजोर नहीं था की उन्हें किसी की जुबान पर डंका डालने की जरूरत पड़े, लेकिन सनातन-आर्यों ने ऐसा किया क्योकि उनका साहित्य सिर्फ और सिर्फ संस्कृत तक ही सिमित था, जो सल्तनत काल और मुग़ल काल में अवधि और ब्राज़ भाषा तक पंहुचा, 1857 में मुसलमानों की हुकूमत ख़तम हो गयी, लेकिन इस वक़्त तक सारा हिन्दुस्तान मुसलमानों की जुबान बोलने लगा था, सनातन-आर्य तादाद में कम जुबान में जुदा जुदा लेकिन साजिश और सियासत के जोर पर हुकूमत का खाब देखते है,
फिर चालबाजी से हिन्दी, हिन्दू और हिंदुस्तान जैसे फ़ारसी लफ्जों का भगवाकरण करते है और तमाम लोगो को इस फरेब में उलझा देते है,
लेकिन झूट और फरेब सच्चाई को मिटाने की चाहे लाख कोशिस करे नहीं मिटा सकते, क्योकि सच्चाई सूरज जैसी वो शमशीर है जो उगने से पहले अँधेरे को चीरकर फ़ना कर देती है,
और कसम परवरदिगार की उसी शमशीर से फरेब के इस जाल को मै मिटा कर ही रहूँगा,,, इंशाअल्लाह,,,

आखिर में मै यही कहना चाहूँगा की मेरे इस आर्टिकल से ये साबित हो चूका है की देवनगर यानी काशी की जुबान हिंदी नहीं थी 18 वी सदी तक वहा सिर्फ और सिर्फ संस्कृत और अवधि का बोल बाला था,,,
लेकिन हिन्दी हमेशा से मुसलमानों की जुबान थी, मुसलमानों की जुबान है और मुसलमानों की जुबान रहेगी,,, इंशाअल्लाह,,,,

वतन है मेरा हिंदुस्तान जुबान हिन्दी है!!!
ख़याल-ओ-दिल का हर साज़-ओ-सामान हिंदी है!!!


बसी है मेरे ज़हन में जिगर में रग रग में,,,
जुदा ना होगी ये इस दिल की जान हिन्दी है!!!


निजामुद्दीन और खुशरो का अदब है ये जुबान,,,
मुश्क-तहज़ीब ये मुगलों की आन हिन्दी है!!!


हुई है दौर-इ-खिज़ा में ये सियासत का सिकार,,,
बनी तबलीग से सच है ये शान-ए-हिन्दी है!!!


जुड़ी है कतरों के तरह ये शहद के जैसे,,,
शहद से मीठी ये मिश्री जुबान हिन्दी है!!!


दिया ना हमने कोई नाम और कहा उर्दू,,,
खुदा गवाह ये हकीकी जुबान हिन्दी है!!!


नहीं है बिखरी अब अफरोज ये लश्कर जैसी,,,
कहो ना उर्दू मुकम्मल जुबान हिन्दी है!!!

जुबां-ए-हिंद हिंदी (उर्दू) को मेरा एक 
छोटा सा नजराना,,,

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