हिमांशु कुमार नायक की कलम से
फंसी पर चढ़ना मंजूर था पर हिन्दुओ के खिलाप केहेना मंजूर नहीं था। अंग्रेजो के लाख कोशिस नाकाम रहे उन्हें हिन्दुओ के खिलाप भड़काने में।
अस्फाकुल्ल्हा खान।इनके बारे में बहुत कम लोग ही जानते है।इनका जन्म उत्तरप्रदेश के ऐताहासिक शहर शाहाजानपुर में हुआ था।भलेही इनके परिवार के बहुत सदस्य पुलिस और प्रशासनिक पदवी पर काम कर रहे थे पर ये सबसे अलग थे।देश को आजाद करना ही इनका मकसद था। पहले ये महात्मा गाँधी जी के असहयोग आन्दोलोन में शामिल थे।पर चौरी-चौरा के हादसे के बाद महात्मा गाँधी ने आन्दोलोन बंद कर दिया था।और वो कुछ लोगो को आपने आन्दोलोन से निकाल दिए थे।उनमे से पंडित राम प्रसाद बिस्मिल और ये भी सामिल थे। अशफाकुल्लाह हमेशा चाहते थे की देश जल्द से जल्द आज़ाद हो और इसलिए वो भी आहिंसा आन्दोलोन का समर्थन नहीं कर रहे थे।इसलिए वो राम प्रसाद ,चन्द्र शेखर आज़ाद और पांच लोगों के साथ मिलकर काकोरी ट्रेन लूटने का योजना तयार किये।क्यों की उन्हें मालुम था की बिना हथियार से अंग्रेजो का मुकाबिला नहीं हो सकता।पर सिर्फ एक महीने में ही अंग्रेजो ने राम प्रसाद बिस्मिल जी गिरफ्तार करने में कामियाब हुए।पर इन्हें नहीं कर पाये।पर कुछ दिन बाद उनके एक अपना ही दोस्त उनसे गद्दारी कर के गिरफ्तार करबा दिया।जिस जेल में इन्हें रखा गया था वहाँ के सुपेरितेंदेंत तादक हुसैन के जरिये अंग्रेजो ने इनको भड़काने की कोशिस किया।उनका केहेना था की राम प्रसाद हिन्दू है और आप मुस्लिम।अंग्रेजो ने बोहोत कोशिस किया राम प्रसाद बिस्मिल के खिलाप इन्हें भड़काने में, पर नाकाम रहे।असफाक जी ने कहा " खान साहब बिस्मिल जी को में आप से बहेतर जानता हूँ।देश को आजाद करने का सपना हम दोनो ने देखा है।" जब अंग्रेज ना कामियाब रहे तोह उन्होंने इनके खिलाप एक गलत केस दर्ज किया और सजा के तौर इन्हें फांसी का हुकुम मिला।मरने से पहेले उन्होंने सिर्फ यही कहा था "अल्लाह ही मुझे इन्साफ दिलाएंगे।मेरे खिलाप जो केस दर्ज हुआ है वो गलत है।में दोषी नहीं हूँ।" बस मरने से पहेले वो प्रार्थना किये और फांसी के रासी को चूमे और लटक गए।
मेरा ये पोस्ट डालने का मकसद ये है की अशफाक जी से बेहेतार नमूना हिन्दू-मुस्लिम भाईचारा का और कही नहीं

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