इंग्लैण्ड का ईसाई पादरी बन गया मुसलमान
ब्रिटेन का एक पूर्व कैथोलिक ईसाई पादरी कुरआन से इतना प्रभावित हुआ कि इस्लाम कबूल कर लिया।
ईमानवालों के साथ दुश्मनी करने में यहूदियों और बहुदेववादियों को तुम सब लोगों से बढ़कर सख्त पाओग। और ईमानवालों के साथ दोस्ती के मामले में सब लोगों में उनको नजदीक पाओगे जो कहते हैं कि हम नसारा (ईसाई) हैं। यह इस वजह से है कि उनमें बहुत से धर्मज्ञाता और संसार त्यागी संत पाए जाते हैं और इस वजह से कि वे घमण्ड नहीं करते।
जब वे उसे सुनते हैं जो रसूल पर अवतरित हुआ है तो तुम देखते हो कि उनकी आंखें आंसुओं से छलकने लगती हैं। इसका कारण यह है कि उन्होंने सच्चाई को पहचान लिया है। वे कहते हैं-हमारे रब हम ईमान ले आए। अत तू हमारा नाम गवाही देने वालों में लिख ले।
(सूरा:अल माइदा ८२-८३)
कुरआन की ये वे आयतें है जिन्हें इंग्लैण्ड में अपने स्टूडेण्ट्स को पढ़ाते वक्त इदरीस तौफीक बहुत प्रभावित हुए और उन्हें इस्लाम की तरफ लाने में ये आयतें अहम साबित हुईं।
काहिरा के ब्रिटिश परिषद में दिए अपने एक लेक्चर में तौफीक ने साफ कहा कि उसे अपनी पिछली जिंदगी और वेटिकन में पादरी के रूप में गुजारे पांच साल को लेकर किसी तरह का अफसोस नहीं है। मै एक पादरी के रूप में लोगों की मदद कर खुशी महसूस करता था लेकिन फिर भी दिल में सुकून नहीं था। मुझे अहसास होता था कि मेरे साथ सब कुछ ठीकठाक नहीं है। अल्लाह की मर्जी से मेरे साथ कुछ ऐसे संयोग हुए जिन्होंने मुझे इस्लाम की तरफ बढ़ाया। ब्रिटिश परिषद के खचाखच भरे हॉल में तौफीक ने यह बात कही।
तौफीक के लिए दूसरा अच्छा संयोग यह हुआ कि उन्होंने वेटिकन को छोड़कर इजिप्ट का सफर करने का मन बनाया।
मैं इजिप्ट को लेकर अकसर सोचता था-एक ऐसा देश जिसकी पहचान पिरामिड,ऊंट,रेगिस्तान और खजूर के पेड़ों के रूप में है। मैं चार्टर उड़ान से हरगाडा पहुंचा। मैं यह देखकर हैरान रह गया कि यह तो यूरोपियन देशों के दिलचस्प समुद्री तटों की तरह ही खूबसूरत था। मैं पहली बस से ही काहिरा पहुंचा जहां मैंने एक सप्ताह गुजारा। यह सप्ताहभर का समय मेरी जिंदगी का अहम और दिलचस्प समय रहा। यहीं पर पहली बार मेरा इस्लाम और मुसलमानों से परिचय हुआ। मैंने देखा कि इजिप्टियन कितने अच्छे और व्यवहारकुशल होते हैं,साथ ही साहसी भी।
ब्रिटेन के अन्य लोगों की तरह पहले मुसलमानों को लेकर मेरा भी यही नजरिया था कि मुसलमान आत्मघाती हमलावर,आतंकवादी और लड़ाकू होते हैं। दरअसल ब्रिटिश मीडिया मुसलमानों की ऐसी ही इमेज पेश करता है। इस वजह से मेरी सोच बनी हुई थी। काहिरा में मुझे अहसास हुआ कि इस्लाम तो बहुत ही खूबसूरत धर्म है। इसको जिंदगी में अपनाने वाले मुस्लिम बहुत ही सीधे और सरल होते हैं। मस्जिद से नमाज की अजान सुनते ही वे अपना काम-धंधा छोड़कर अल्लाह की इबादत के लिए दौड़ पड़ते हैं। वे अल्लाह की इच्छा और इसकी रहमत पर जबरदस्त भरोसा रखते हैं। वे पांच वक्त नमाज अदा करते हैं,रोजे रखते हैं,जरूरतमंद लोगों की मदद करते हैं और हज के लिए मक्का जाने की ख्वाहिश रखते हैं।
'काहिरा से लौटने के बाद मैं धार्मिक शिक्षा देने के अपने पुराने काम में फिर से जुट गया। ब्रिटेन में धार्मिक विषयों का अध्ययन अनिवार्य विषय के रूप में है। मैं ईसाइयत,इस्लाम,यहूदी,बोद्ध और अन्य धर्मों के बारे में स्टूडेण्ट्स को पढ़ाता था। इस वजह से मुझो इन धर्मों के बारे में अध्ययन करना पड़ता था कि मैं इन्हें इन धर्मों के बारे में बता सकूं । मेरी क्लास में कुछ अरब के मुस्लिम छात्र भी थे। यूं समझिये की इस्लाम के बारे में पढ़ाने के लिए खुद अध्ययन करते वक्त मैंने इस्लाम के बारे में काफी कुछ जाना।'
'अरब के वे मुस्लिम छात्र बहुत ही नम्र,शालीन और व्यवहारकुशल थे। मेरी उनसे दोस्ती हो गई। उन्होंने मुझसे मेरे क्लासरूम में रमजान के महीने के दौरान नमाज पढऩे की इजाजत मांगी। दरअसल मेरे क्लासरूम में कारपेट बिछा होता था। वे नमाज अदा करते और मैं उनको पीछे बैठकर देखता रहता। उनसे प्रेरित होकर मैंने भी रोजे रखे हालांकि अभी मैं मुसलमान नहीं हुआ था।
'एक बार कुरआन का अध्ययन करते वक्त मेरे सामने यह आयत आई-
जब वे उसे सुनते हैं जो रसूल पर अवतरित हुआ है तो तुम देखते हो कि उनकी आंखें आंसुओं से छलकने लगती हैं। इसका कारण यह है कि उन्होंने सच्चाई को पहचान लिया है। वे कहते हैं-हमारे रब हम ईमान ले आए। अत तू हमारा नाम गवाही देने वालों में लिख ले।
यह आयत पढऩे के बाद मैं यह देखकर हैरान हो गया कि मेरी आंखों से आंसू निकल रहे हैं। मैंने मुश्किल से स्टूडेण्ट्स के सामने अपने आंसू छिपाए।'
और जिंदगी बदल गई:
अमेरिका पर ११ सितम्बर २००१ को आतंकी हमला होने के बाद तौफीक की जिंदगी में एक बहुत बड़ा बदलाव आया।
'उन दिनों मैं भी बाहर नहीं निकला और मैंने देखा कि लोग काफी भयभीत थे। मैं भी काफी डरा हुआ था और आशंका थी कि इस तरह के आतंकी हमले ब्रिटेन में भी हो सकते हैं। उस वक्त पश्चिम के लोग इस्लाम से घबराने लगे और उन्होंने आतंकवाद के लिए इस्लाम को जिम्मेदार ठहराना शुरू कर दिया।'
'हालांकि मेरा तो मुसलमानों के साथ अलग तरह का अनुभव था और मैं इसके लिए इस्लाम को कतई जिम्मेदार नहीं मानता था। मुझो हैरत हुई-इस्लाम इसके लिए जिम्मेदार कैसे हुआ? कुछ सिरफिरे मुस्लिमों द्वारा किए गए इस कुकृत्य के लिए आखिर इस्लाम को दोषी कैसे माना जा सकता है? जब ऐसी ही किसी घटना को कोई ईसाई अंजाम देते हैं तब तो इसके लिए ईसाइयत को जिम्मेदार नहीं माना जाता?
एक दिन मैं इस्लाम के बारे में और भी जानने के लिए लंदन की सबसे बड़ी मस्जिद लन्दन सैन्ट्रल मस्जिद पहुंचा। वहां इस्लाम कबूल कर चुके पूर्व पॉप स्टार यूसुफ इस्लाम एक सर्किल में बैठकर लोगों से इस्लाम के बारे में चर्चा कर रहे थे। वहां पहुंचने के थोड़ी देर बाद मैंने उनसे पूछा- आखिर आपने इस्लाम क्यों कबूल किया?
उन्होंने जवाब दिया-एक मुस्लिम एक ईश्वर में भरोसा करता है। पांच वक्त नमाज अदा करता है। रमजान के रोजे रखता है। मैंने बीच में ही उनको रोकते हुए कहा-मैं भी इन सब में भरोसा रखता हूं और रमजान के दौरान रोजे रखता हूं।,उन्होंने कहा-फिर तुम किस बात का इन्तजार कर रहे हो? कौनसी बात तुम्हें मुसलमान होने से रोके हुए है? मैंने कहा-नहीं, मेरा धर्म-परिवर्तन का कोई इरादा नहीं है।
इसी पल नमाज के लिए अजान हुई और सभी वुजू बनाकर नमाज अदा करने के लिए लाइन में जाकर खड़े हो गए। मैं पीछे की तरफ बैठ गया। मैं मन ही मन चिल्लाया। मन ही मन सोचा आखिर मैं ऐसी बेवकूफी क्यों कर रहा हूं? जब वे नमाज पढ़ चुके तो मैं यूसुफ इस्लाम के पास गया और इस्लाम कबूल करने के लिए कलमा पढ़ाने के लिए उनसे कहा। यूसुफ इस्लाम ने पहले मुझे अंग्रेजी में अरबी कलमे के मायने बताए और फिर मैंने भी कलमा पढ़ लिया- 'अल्लाह के सिवाय कोई इबादत के लायक नहीं और मुहम्मद सल्ल. अल्लाह के पैगम्बर हैं।'
यह कहते हुए तौफीक की आंखों में आंसू निकल पड़े।
इस तरह तौफीक की जिंदगी ने एक नई दिशा ली। इजिप्ट में रहते हुए तौफीक ने इस्लाम के उसूलों पर एक किताब गार्डन ऑफ डिलाइट लिखी।
मैं लोगों को बताता हूँ कि इस्लाम तो इंसानियत को बढ़ावा देने वाला मजहब है जिसमें सबके साथ बेहतर सलूक करने पर जोर दिया गया है। पैगम्बर मुहम्मद सल्ल. फरमाते हैं-अपने भाई को देखकर मुस्कराना भी नेकी है।
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